Friday, May 9, 2014

एक कहानी : तृप्ती

        " राहुल " ने कैब से उतरते हुये ड्राईवर से किराया पुछा ! जवाब मिल : सर, कुल तीन सौ चार रुपए , आपको बिल चाहिए ? राहुल ने मुस्कुराते हुये तीन सौ पाँच रुपये उसकी तरफ बढ़ा दिए और पुणे स्टेशन के मेन एन्ट्रेंस कि तरफ़ अपना लैपटॉप क बैग सँभालते हुये चल दिया !
 
            स्टेशन पर गहमा गहमी थी ! गर्मी भी बढ़ गयी थी लेकिन सहन करने लायक ! राहुल के मन में कुछ था , आँखे किसी तो ढूंढ रही थीं !डिस्प्ले बोर्ड पर अभी उसकी ट्रैन कि कोई सूचना नहीं थी ! प्लेटफॉर्म एक पर इंदौर पुणे एक्सप्रेस ट्रेन चलने को तैयार खड़ी थी शायद इसके बाद उसकी ट्रैन लगे सोच कर वहीँ खड़ा हो कर अपनी ट्रैन कि सुचना का इंतज़ार करने लगा और निगाहें किसी और का !
 
           एक पानी की बोतल खरीदने के बहाने राहुल ने अपनी ट्रैन के बारे में दुकानदार से पुछा ! जानकारी मिल गयी कि उसकी ट्रैन प्लेटफॉर्म एक पर ही आएगी ! प्लेटफॉर्म एक पर पहुच कर इधर उधर देखा शायद वो दिख जाये जिसे कभी देखा नहीं ! जब से पुणे से दिल्ली की टिकट एजेंट ने उसके हाथ में रखी थी , वो किसी को तलाश रहा था ! दरअसल एजेंट ने तत्काल टिकिट मे दो लोगो का टिकिट किया था एक राहुल का और एक तृप्ती का ! पता नहीं कैसी , कौन होगी उधेड़बुन मे वो १/२ घंटे पहले ही स्टेशन पहुँच गया था !
 
           इंदौर दिल्ली एक्सप्रेस धीरे धीरे सरकने लगी थी ! डिस्प्ले बोर्ड पर अब राहुल की ट्रेन की सूचना आ गयी थी ! कोल्हापुर हज़रत निज़ज़मुद्दीन एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म नंबर एक जाएगी , शाम ४:१० बजे ! वो प्लेटफॉर्म पर जाने वाले रास्ते पर खड़ा हो कर अपनी तलाश में लग गया ! एक दो बार लग कि शायद वो हो लेकिन कभी वो अपनी माँ , पिता के साथ थी तो कहीं अपने भाई के साथ तो कभी अपने दोस्तों के साथ , उसे तो तलाश थी तो अकेली तृप्ती की जिसका टिकट उसके साथ हुआ था !
 
तभी चाय का प्याला लिये किसी ने राहुल के कंधे पर हाथ रखते हुये पूछा : ये आने वाली गाड़ी दिल्ली जाएगी ,सर ?
 
राहुल ने पलट कर देखा और कहा : जी हाँ !
 
लड़की : थैंक्स !
 
राहुल : आपका नाम तृप्ती है ?
 
लड़की : जी नहीं मुझे प्रज्ञा कहते हैं , क्यों ?
 
राहुल सकपकाते हुये बोल : असल में तृप्ती नाम की लड़की का टिकिट मेरे साथ हुआ है और वो अभी तक आयी नहीं और ट्रैन के चलने का वक़्त हो गया है , इस लिए पूछ रहा था !
 
लड़की : ओके बाय ! हैप्पी जर्नी  कहते हुई आगे बढ़ गई !
 
राहुल अब फिर अकेला था !
 
ट्रैन प्लेटफॉर्म पर लग चुकी थी ! राहुल बहुत धीरे - धीरे कोच B1 की तरफ बढ़ा ! चिपके हुये चार्ट पर अपना नाम देख और साथ में  उसका भी देख लिया कि ठीक  प्रिन्टेड है की नहीं 15 नम्बर कि बर्थ पर , जो की था !
 
थोड़ी देर में पूरा कोच हमसफ़रों से भर गया !
 
15 नम्बर कि बर्थ पर एक २३ , २४ साल की लड़की बैठी थी ! सोबर और शांत ! हलके गुलाबी रंग के चिकनकारी के सूट और सफ़ेद सलवार पहने ! घुटनो को अपने ओर मोड़े , बाँहों को मोड़ कर अपने चेहरे को बाँहों पर टिकाये एक टक खिड़की से बाहर देखते हुए !
 
तलाश ख़त्म हुई ! ट्रैन दिल्ली की तरफ बढ़ चाय !  दोनों ने चाय खरीदी ! तृप्ती ने अलग और राहुल ने अलग ! अभी तक दोस्ती कि कोई सूरत नहीं बन सकी थी दोनो के बीच ! ट्रैन ने १० मिनट का सफर पूरा कर लिया था !
 
लाओ अपना खाली चाय का कप दे दो मैं बाहर जा रहा हूँ, फेंक दूंगा ! राहुल ने चाय पी चुकी तृप्ति से कहा !
 
नहीं मैं फेंक दूँगी : तृप्ती संकोच से मुस्कुराते हुये बोली !
 
राहुल : अरे , लाओ भी !
 
राहुल के इस आदेशात्मक निवेदन पर तृप्ती ने ख़ाली कप उसके हाथों पर रख दिया !
 
टी  टी को एक ही आय कार्ड पर विश्वास हो गया ! अब तक सब ठीक था दोनो के लिए !
 
डिनर साथ ही किया दोनो ने ! 
 
ट्रेन अपनी रफ़्तार पर थी ! गति का एहसास ए सी कोच मे ठीक से हो जाता है ! हिचकोले ले कर चलती ट्रेन में राहुल ने तृप्ती के लिए बिस्तर लगा दिया था और खुद भी मिड्डिल बर्थ पर लेट गया था ! लेटते हि नींद आगयी थी उसे ! ठंडी हवा और दिन भर की थकान के बाद नये दोस्त का साथ उसे संतुष्ट कर रहा था !
 
ट्रेन के रुकने पर अचानक राहुल की नींद खुली और ध्यान तृप्ती कि तरफ गया वो किसी से मोबाईल पर  बात कर रही थी ! गला रूँधा हुआ , पलकें भीगी हुई , माथे पर शिकन परेशान सी लग रही थी वो ! वो उसे देखता रहा ! पूरी बात के दौरान उसने उसे नहीं टोका ! लगभग 15 मिनट के बाद जब फ़ोन खतम हुआ तो उसने पुछा !
 
क्या हुआ ? कुछ परेशानी है ?
 
तृप्ती : हाँ , मेरी शादी करना चाहते हैं सब !
 
राहुल : तो , इसमें क्या परेशानी है ! शादी तो सबकी होती है ! तृप्ती कि भी होगी ही !
 
तृप्ती : परेशानी ये नहीं की शादी है ! परेशानी ये है की मैंने अभी अभी जॉब शुरु कि है पढ़ाई के बाद और मैं चाहती हूँ की कम से कम ३ साल के बाद मेरी शादी हो और घर वाले जहाँ कहेंगे वही कर लूंगी !
 
राहुल : ३ साल बाद शादी करने का सही कारण क्या है ?
 
तृप्ती : बताया ना , अभी अभी इनफ़ोसिस मे जॉब शुरु कि है ! अब तक पढ़ती रही अब कुछ समय तो खुद को साबित करू फिर जहाँ वो कहेंगे मै शादी कर लूंगी !
 
राहुल : और अपने घर वालों के नज़रिये से देखो , इन ३ सालों में तुम्हे इनफ़ोसिस मे कोई और पसन्द आ गया तो ?
 
तृप्ति : तो क्या वो अगर उन्हें नहीं पसन्द होगा तो नहीं करूंगी वैसे तो ऐसा कुछ होगा नहीं !
 
राहुल : हम्म  !!
 
तृप्ती : तुम मेरे पेरेन्ट्स बात करो प्लीज़ , उनको समझाओ !!

          तीन घंटो में इतना विशवास की जीवन के इतने बड़े निर्णय में तृप्ति को राहुल की मदद लेने में हिचक नहीं थी ! सम्भावनाये हमारे इर्द गिर्द बिखरी पड़ी होती हैं बस ज़रुरत होती है तो ललक की और किसी सहायक की जो एक झटके में आपके जीवन में परिवर्तन ला सके !

        ये को बात करो , मेरा छोटा भाई है फोन पर ! तृप्ति ने अपना मोबाइल राहुल की तरफ बढ़ाते हुए निवेदन किया ! राहुल ने झिझकते हुए मोबाइल पकड़ा और बात शुरू की !

राहुल : हेलो , मैं राहुल बोल रहा हूँ !

दूसरी तरफ से : जी ? मैंने आपको पहचाना नहीं ! दीदी के फोन से आप कैसे बात कर रहे हैं ? दीदी कहाँ हैं ? कुछ हुआ है क्या उनको ? वो खुद बात क्यों नहीं करती ?

अरे नहीं , कहते हुए राहुल ने इशारे से तृप्ति से भाई का नाम पुछा और तृप्ती ने विवेक बताया !

राहुल : अरे विवेक मैं तुहारी दीदी का दोस्त हूँ और उन्हें कुछ नहीं हुआ है , बल्कि उन्होंने ही मुझे तुमसे बात करने के लिए कहा है और अगर तुम मेरी बात सुनो और समझो तो तुम अपनी दीदी को एक मुसीबत से बचा सकते हो !

विवेक : हाँ , कहिये क्या बात है ?

राहुल : तुम किस क्लास में पढ़ते हो पहले ये बताओ !

विवेक : 12th में !

राहुल :  अच्छा विवेक तुम्हे ये कहा जाये की 12th के बाद तुम्हे आगे पढाई नहीं करनी और अमेरिका में अच्छी जॉब करनी है तो तुम्हारा रिएक्शन क्या होगा ?

विवेक : ये कैसा सवाल है ?

आस पास की बर्थ पर ऊँघ रहे लोगो ने भी राहुल की तरफ कुछ उत्सुकता से देखा !

राहुल : हाँ ऐसा ही सवाल तुम्हारे माँ और बाबा ने तृप्ति के सामने रखा है !

विवेक : शादी का ?

राहुल : हाँ !

विवेक : तो इसमें क्या बुराई है ? सब की शादी होती है , दीदी की भी होगी !

राहुल : हाँ इसमें कोई बुराई नहीं बस वो ये चाहती है की उसकी शादी तीन साल के बाद हो ! अभी अभी अच्छी पढाई के बाद अच्छी नौकरी लगी है ! कुछ ये टाईम भी एन्जॉय कर ले और खुद को साबित कर सके फिर शादी तो होनी ही है !

विवेक : ओह्ह , तो आपको ये बात माँ और बाबा से करनी चाहिए ! शादी का निर्णय उन्होंने लिया है और इस पर आगे भी विचार वो ही करेंगे!

राहुल : हाँ दोस्त , अगर तृप्ति कहेगी तो मैं उनसे भी बात करूंगा लेकिन तुम बताओ की तुम अपनी दीदी के साथ हो ?

विवेक : हाँ , मैं दीदी के साथ हूँ ! अब मेरी दीदी से बात करवाइये !

तृप्ती धीरे धीरे बात सुनते हुए राहुल के कन्धों पर झुक गयी थी और सब सुन रही थी !

राहुल : लो, वो तुमसे बात करना चाहता है !

तृप्ती ने झिझकते हुए फ़ोन पकड़ा और अपने बालों को कान के पीछे करते हुए हेलो बोला !

राहुल ने अपने काम कर दिया था ! पहली जिम्मेदारी निभा दी थी ! विशवास के गर्भ से उत्पन्न हुई निवेदन भरी जिज्ञासा को उचित भविष्य की आस देने की जिम्मेदारी !

ट्रेन एक अँधेरे स्टेशन पर रुकी थी ! घुप्प अँधेरा पसरा था ! राहुल और तृप्ती दरवाज़े पर खड़े थे तो कोच अटेंडेंट ने उन्हें भीतर आने का इशारा किया रु दरवाज़ा ये कहते हुए बंद कर दिया की साब आगे घाट का रास्ता है और यहाँ डर है !

विवेक : हेलो दीदी , कैसी हैं आप ?

तृप्ती : मैं ठीक हूँ ! तू कैसा है ! बस माँ के अर्जेंट बुलावे पर तत्काल की टिकट ले कर आ रही हूँ !

विवेक : आइये आइये और अपने साथ उन दोस्त को भी लाइयेगा ! वैसे मैं हूँ तो बहुत छोटा आपसे लेकिन कुछ कुछ समझ रहा हूँ और अपने लेवल पर कोशिश करूंगा की आप के मन की बात हो सके !

तृप्ती : अच्छा सब समझ गया तू ?

विवेक : नहीं सब तो नहीं बस ये समझा की आप अभी शादी के लिए तैयार नहीं हैं , कुछ वक़्त चाहती हैं !

तृप्ति : ठीक है मेरे भाई , अब ज़रा माँ से बात करवा !

विवेक : माँ और बाबा सो गए हैं ! आप लोग ट्रैन में हैं इस लिए टाइम का अंदाज़ा नहीं है  , रात के 12 बजने को हैं !

तृप्ति : अरे हाँ , ठीक है कल सुबह 7 बजे कॉल करूंगी , फिर माँ से बात करेंगे !

विवेक : दीदी आपको याद है जब मैं 8th में था और दासगुप्ता अंकल की स्कूटी से जब मैंने टक्कर मारी थी तो अपने क्या किया था !

तृप्ती : हाँ याद है , अब ठीक चला लेता है की अब भी इधर उधर हो जाती है ?

विवेक : दीदी उनके एक बेटी है सुलोचना आजकल यही है , 8th के बाद वो यही आगयी थी बोर्डिंग स्कूल से और अब मैं उसको ले कर आता जाता हूँ !

तृप्ती : ओह्ह , मैं तो भूल गयी थी की तू अब 12th क्लास के टीनएजर है !

विवेक : तो फिर आपका ये भाई आपके साथ था और रहेगा ! अब आप सोइये और अपने उन दोस्त का नाम बता कर उनको फ़ोन दीजिये !

तृप्ति : उनका नाम राहुल है उन्होंने खुद बताया तो था तुम्हे ! चलो मेरी good night  ! अब राहुल से बात करो !

राहुल : मुझे राहुल कहते हैं दोस्त !

विवेक : ठीक है राहुल जी , शुभ रात्रि , कल फिर बात होगी !

        तृप्ती वाशरूम से निकली और अपनी बर्थ पर लेट गयी और राहुल अपनी बर्थ पर ! दोनों सोने की असफल कोशिश करने लगे ! दोनों को लग रहा था की कुछ सफलता हाथ लगी ! दोनों अपनी अपनी अधूरी सफलता पर खुश थे ! गहरी साँसों से दोनों ने एक दूसरे को फॉर्मल शुभ रात्रि कहा फिर पलकों में कल की योजनाओ के बीज बो दिए जिनके अंकुर सुबह 7 बजे फूटने वाले थे !

तुम चाय अभी लगी या फ्रेश होने के बाद ? राहुल ने अधिकार से तृप्ती से पुछा !

तृप्ति : तुम ले कर रखो मैं आती हूँ वाशरूम से !

अगल बगल के साथी रात भर में बदल गए थे ! कुछ बर्थ खाली थीं तो कुछ पर साथी बदल चुके थे !

राहुल तृप्ति की तरफ चाय का प्याला बढ़ते हुए बोला : डिप चाय में कड़कपन नहीं होता इस लिए मैंने एक ही कप में दो टी बैग डलवा लिए हैं , लो पियो !

तृप्ती की अँगुलियों का स्पर्श राहुल की हथेलियों से हो गया ! असीम अपनत्व का संचार हो चूका था दो आत्माओं में !

साइडलोअर सीट के बड़े से शीशे से उगता हुआ सूरज देख रही थी तृप्ती , सम्भावनाओ को मूर्तरूप देने के प्रयास में !

राहुल : मैं अभी वाशरूम से आता हूँ !

तृप्ती ने अपने हैंडबैग से अपना फेस वाश निकल कर राहुल की तरफ बढ़ा दिया और कहा : लो इस से साफ़ करना इतना ऑयली ऑयली हो गया है रात भर में !

अपनत्व भरा प्रतिवेदन स्वीकार किया राहुल ने !

ट्रैन के नए साथी इन दोनों को कुछ और समझ रहे थे जो हम जानते हैं ,वो तो बिलकुल ही नही !

तृप्ती : हेलो माँ , कैसी हो ?

माँ : हेलो बेटा , कहाँ तक पहुंची ?

तृप्ती : अभी झांसी पहुंच रही हूँ और फिर ५ , ६ घंटों में दिल्ली !

माँ : ठीक है , तेरे बाबा आयंगे तुझे लेने के लिए स्टेशन पर !

तभी पीछे से विवेक बोला : नहीं माँ मैं जा रहा हूँ दीदी को लेने , बाबा शाम की फ्लाइट से अर्जेंट मुंबई जा रहे हैं !

तृप्ति : माँ मेरे एक दोस्त तुमसे बात करेंगे , उनका नाम राहुल है !

माँ : हाँ ज़रूर बेटा बात करवाओ ! वैसे इनका ज़िक्र तुमने पहले कभी नहीं किया !

माँ की इस बात का जवाब तृप्ति देती की इस से पहले वो फ़ोन राहुल को दे चुकी थी !

राहुल : नमस्ते माँ जी , कैसी हैं आप ?

माँ : नमस्ते बेटा ! मैं ठीक हूँ तुम दोनों कैसे हो ! कुछ नाश्ता पानी हुआ तुम लोगों का ?

राहुल : जी , अभी चाय और बिस्किट खाए हैं , थोड़ी देर में नाश्ता करेंगे !

माँ : हाँ अच्छी बात , सफर में खाते पीते रहना चाहिए !

राहुल : हाँ माँ जी खाते पीते तो रहना चाहिए लेकिन समय आने पर ही तो !

माँ : हाँ एकदम सही बात ! समय पर खाया पिया पचता है ! असमय खाया पिया तबियत खराब कर देता है !

राहुल : माँ एक बात कहूँ ?

माँ : हाँ , बोलो बेटा !

तृप्ती लगभग राहुल के कन्धों पर अपना सर टिका कर सब सुन रही थी !

राहुल : माँ , अगर तृप्ति की शादी ३ साल के लिए टल जाती तो उसके लिए अच्छा होता ! उसको लगता है की ये सही समय नहीं है उसकी शादी का !

माँ : ओह्ह्, तो ये बात है ! तुम्हे भी लगता है की ये सही समय नहीं है उसकी शादी का ? २३ , २४ साल की हो गयी, पढ़ लिख ली , अच्छी नौकरी मिल गयी और अब किस चीज़ का इंतज़ार ?

राहुल : नहीं माँ  और बाबा से ज़यादा भला और कौन सोच सकता है बच्चों का लेकिन उस को बस नौकरी में अच्छी पोजीशन चाहिए , खुद को साबित करने का टाइम चाहिए जो शादी के बाद नहीं मिलेगा ! बस ३ साल और रुक जाते तो अच्छा होता !

माँ : फिर क्या होगा ?

राहुल : उसको संतुष्टि मिलेगी की जो उसने पढ़ा उसका उसने लाभ लिया !

माँ : और परिवार के मान और संतुष्टि का क्या ?

राहुल : फ़िक्र है ना उसकी भी उसको , ३ साल बाद करेगी ना शादी जहाँ आप कहेंगे वहां पर ही !

माँ : नौकरी तो वो शादी के बाद भी कर सकती है !

राहुल : माँ और बाबा के अंचल में बच्चा जितना स्वछंद और निर्भय होता है क्या वो कहीं और हो सकता है माजी ?

माँ को इस के आगे और कोई प्रश्न नहीं सूझ रहा था ! निरुत्तर हो चुकी थी वो !

राहुल ने पुछा : माँ आप लाइन पर हैं ?

माँ ने रूंधे गले से कहा : हाँ , तृप्ती को फोन दो !

राहुल ने तृप्ति को फोन दिया और उलटे हाथ से थम से जीत का इशारा किया ! तृप्ति ने एक हाथ से फोन और एक आठ से राहुल का हाथ पकड़ लिया और बर्थ पर बैठते हुए बोली :

हेलो माँ : कैसी हो ?

माँ : अपने बाबा से राहुल बात करा देना , वैसे मैं तेरी बात समझ गयी हूँ बेटा, हमारे निर्णय पर इतना परेशान क्यों हुई तू रे , एक बार बोला होता तो इतना आगे बात नहीं बढ़ाते है ! खेर , राहुल की बात ज़रूर करवा देना अपने बाबा से , वो मुंबई जाने वाले है आज !

फोन विवेक ने ले लिया था : दीदी शाम को मैं आ रहा हूँ आपको लेने ! बाबा अभी ऑफिस के लिए तय्यार हो रहे हैं ! आप बात ज़रूर कर लेना !

तृप्ति : ओके ठीक है ! और तो स्कूटी धीरे चलना !

विवेक : ठीक है दीदी , वैसे अब मैं स्कूटी नहीं चलता ! शाम को सरप्राइज़ दूंगा !

और फोन कट गया था !

राहुल ने नाश्ते में पोहा और कॉफी ऑर्डर किये थे ! दोनों ने नाश्ता किया और लेट गए अपनी अपनी बर्थ पर अपनी अपनी सफलताओं की सीढ़ियों को गिनते हुए , की अभी कितनी बाकि है ! दोनों की ट्रैन एक थी लेकिन मंजिल अलग अलग एक ही रह पर !

झाँसी में साँची के मीठे दूध के दो पैकेट लिए राहुल ने ! तृप्ती को मीठा पसंद नहीं था फिर भी राहुल का एक अनाम अधिकार हो चला था उस पर की उसके कथ्य को निर्विरोध स्वीकार करती जाती थी , सासम्मान !

तृप्ती : नमस्ते बाबा ! कैसे हैं ?

बाबा : मैं ठीक हूँ बेटा , सॉरी अर्जेंट काम से मुंबई आ गया , नहीं तो तुझे लेने मैं ही आने वाला था !

तृप्ति : हाँ बाबा , माँ और विवेक से बात हुई मेरी अभी ! बाबा मेरे एक दोस्त आपसे बात करेंगे !

बाबा : बिलकुल करवाओ बेटा !

राहुल के हाथो में मोबाइल दे चुकी थी तृप्ती और पूरी झुक गयी थी राहुल की छाती पर कशमश में की बाबा का रिएक्शन क्या होगा और राहुल ने अपने उलटे हाथों से उसको सहारा दिया था जैसे गमले के फैलते पौधों के समेट दिया जाता है एक सहारे से की बिखराव ना हो !

राहुल : नमस्ते अंकल जी !

बाबा : नमस्ते बेटा !

राहुल : कैसे हैं आप ?

बाबा : मैं एकदम ठीक हूँ ! आप तृप्ति के साथ काम करते हैं ?

राहुल : नहीं बाबा मैं तो बस इस ट्रैन में इनका दोस्त बना हूँ और दोस्ती इतनी हो गयी की इन्होने आपसे बात करवा दी !

बाबा : हाँ तो क्या हुआ , दोस्ती की कोई सीमा , उम्र नहीं होती !

राहुल : एक दम सही कहा आपने अंकल किन्तु आप ही बताइये दोस्ती और उसके संबंधों में परिवर्तिति होने के लिए समय दिया जाना चाहिए की नहीं ?

बाबा : हाँ वो तो है , किसी भी सम्बन्ध को बनाने के लिए समय दिया जाना ज़रूरी है और जो सम्बन्ध जल्दीबाजी में बनते हैं उनकी सीमाये काम और लचीली होती हैं जो नुक्सानदायक है !

राहुल : बाबा तृप्ति के तरफ से आप से एक रिक्वेस्ट करना चाहता था !

बाबा : हाँ कहो ?

राहुल : क्या तृप्ति की शादी की डेट ३ साल आगे नहीं बढ़ सकती ?

बाबा : क्यों तृप्ति इस रिश्ते से खुश नहीं है ?

राहुल : इस समय हो रिश्ता चाहती ही नहीं है ! ३ साल का समय चाहती है और उसके बाद परिवार जहाँ कहेगा वह शादी कर लेगी !

बाबा : ये बात तो वो खुद भी कह सकती थी मुझे से !

राहुल : हाँ बाबा मैंने बोला था उसको  की वो सीधे सीधे बात करे आप से लेकिन सोबर बच्ची है ना इस लिए रेस्पेक्ट में ये सब नहीं कर सकी बस लक्कीली मैं साथ था तो मेरे थ्रू उसके अपनी बाद रख दी आपके सामने ! आपने सब ने उसकी हर ज़रुरत का ख्याल रखा ! पढ़ाया और अच्छी नौकरी के लिए पुणे जाने की इज़ाज़त दी फिर शादी के सवाल पर तो आपका अधिकार है लेकिन वो चाहती है की शादी ३ साल बाद हो अभी नहीं ! २६ की उम्र के बाद !

राहुल बोलता जा रहा था और बाबा की आवाज़ नहीं आ रही थी !

राहुल : बाबा आप सुन रहे हो ना ?

बाबा : हां , मैं सब सुन रहा हूँ !

राहुल : तो आप अपनी तृप्ति का निवेदन मानेगे ?

बाबा : अपनी गुड़िया की ख़ुशी के लिए सब किया है तो ये भी मानूंगा , बस ज़रा उसके भाई और माँ राय  कर लू !

राहुल ने बिना देरी लगाये उत्तर दिया , उनसे बात हो गयी है सब तय्यार हैं बस आप की मंजूरी चाहिए !

बाबा : ठीक है तो ये तय रहा की जब ये चाहेगी और जहाँ चाहेगी तब उसकी शादी हम करंगे !

राहुल ने धन्यवाद दिया और अपने से लगभग लिपटी हुई तृप्ति को माथे पर चूम लिया !

अपनी सफलता पर दोनों खुश थी ! एक सफलता निश्चित थी तो दूसरी अभी हमारे दिमाग़ में आकार ले रही थी ! की क्या होगा !

ट्रैन निजामुद्दीन स्टेशन पर लग रही थी !

राहुल : ओके बाय , काल करना !

तृप्ति : अरे , विवेक से तो मिलते जाओ !

राहुल : नहीं मेरी बस निकल जाएगी , हम पहले ही लेट हो चुके हैं !

तृप्ति ने राहुल से हाथ मिलाया और अपने अगले सफर पर चल दिए , लाखों उमीदें पाले !

                  !! करीब दो साल बाद !!

राहुल के मोबाइल पर अननोन नंबर से कॉल आई ! रात के कुछ १० बजे होगे ! अपना अंतिम बुलेटिन पढ़ कर चलने की तैयारी में था वो !

राहुल : हेलो जी , कौन बोल रहाहै ?

दूसरी तरफ से : राहुल बेटा मैं तुम्हारी दोस्त तृप्ति का बाबा बोल रहा हूँ !

राहुल : ओह्ह बाबा , कहाँ हैं आप लोग  ? दो साल से कुछ खबर नहीं ! जो नंबर थे सब पर काल किया पर किसी को आप के बारे में खबर नहीं ! खैर , तृप्ति कैसी है ? कहाँ है ? जॉब कैसी चल रही है उसकी ? शादी कब है ? उसका नंबर तो चालू है पर २ साल में एक बार भी उसने मेरी काल नहीं ली और न ही काल बैक किया !

बाबा : बेटा क्या मैं तुमसे अभी मिल सकता हूँ ?

राहुल : हाँ , एड्रेस बोलिए मैं आ जाता हूँ !

राहुल ने डोरबेल बजाई , दरवाज़ा तृप्ति ने खोला ! सुहागन के रूप में !

राहुल : अरे तेरी शादी कब हुई ? बुलाना तो चाइये था ना भाई !

बाबा ने बात संभाली , अंदर आओ बेटा !

       बेटा उस दिन जब ये घर आई तो मैं तो मुंबई में था इसके ताऊ जी ने लड़के वालों को घर पर बुला रखा था और हम पता भी नहीं ! फिर उनके सामने ना तो इसकी माँ और न ही ये खुद माना  कर सकी और उसी दिन इसकी सगाई हो गयी  ! १ महीने बाद शादी भी ! शादी के एक हफ्ते बाद लड़का अमेरिका चला गया और अब वो लोग कहते हैं की ५  साल का प्रोजेक्ट है तब ही वापस आएगा और इसको वहां बुला भी नहीं सकता ! अब तृप्ति के लिए तो  वो तो घर जेल है ! ससुराल वालो बात करी तो वो कहते हैं की आप तलाक़ ले कर इसकी दूसरी शादी करा लो !

तुम्ही सलाह दो की अब हम क्या करें ?

राहुल : तृप्ति क्या चाहती है ?

तृप्ति : जब जो चाहती थी वो नहीं हुआ तो अब क्या चाहूंगी ?

राहुल : तुम मुझ से शादी करेगी ? मैं वादा करता हूँ की तुझे लिए बिना कभी अमरीका नहीं जाऊंगा !

विवेक ने इतना सुना और राहुल से लिपट गया तृप्ति की आँखे छलक आइ थीं ! बाबा और माँ एक दूसरे को देखते जाते थे !

दो साल पहले अगर ये ही प्रयास किया होता तो तृप्तता आज स्वयं तृप्त होती ! किन्तु ये सत्य है सम्बन्धो में परिवर्तन के लिए दोस्ती को समय दिया जाना ज़रूर चाहिए और ज़रूरी है की भवनाओं का सम्मान हो उचित समय पर !

एक कहानी : तृप्ती

                                 ~~~~   समाप्त ~~~~ 

Sunday, April 27, 2014

मन कहता है यादें उसकी ,दाग़ लगे ,पीले काग़ज़ !!

!! एक !!
मन कहता है यादें उसकी ,
दाग़ लगे  ,पीले काग़ज़ !

सूनी क्लासें,लम्बी गलियां,
तन्हाई में अपनापन,
खिड़की उसकी धुप घोलती,
आँखों में स्याही चन्दन !
जबतक समझे स्नेह नेह ये,
समझ बढ़ी और दूर हुए,
पानी उतरा आँखों से कुछ,
होठों ने भी शब्द छुए !!
नहर किनारे बूढा पीपल,
आस लिए कुछ कहता है,
फिर गूँजेंगीं  नेह किताबें,
और उछलेंगे वो काग़ज़ !
वो सब बीता , बीता गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा !
साँसों साँसों बढ़ते जाते,
मैं भी ,वो भी ,और  हम सब ,
मन कहता है यादें उसकी ,
दाग़ लगे ,पीले काग़ज़ !



!! दो !!

जलते बुझते लैम्प सरीखे,
रात से दिन और दिन से रात,
कई किताबें ,खाली पन्ने,
लाखों शब्द अधूरी बात !
हलके हलके बढ़ता जाता,
एक  नशा , एकांकीपन,
जैसे मुझको उसको भी हो,
बस मेरा ,मेरा बन्धन !!
टुकड़े टुकड़े जुड़ते जाते,
जीवन के कुछ गहरे सत्य,
पंक्ति में फिर अंतिम दिखते,
यौवन के वो अगले कृत्य !!
मन का कोना ऐसा जैसे,
भरी दुपहरी खाली घर,
कितना कुछ करने की चाहत,
नहीं नियंत्रण ,पर ,मन पर !!
वो सब बीता ,बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा ,
साँसों साँसों बढ़ते जाते,
मैं भी ,वो भी ,और हम सब !
मन कहता है , यादें उसकी,
दाग़ लगे ,पीले काग़ज़ !!

!! तीन !!

गलियों गलियों  बारिश बारिश,
कश्ती कश्ती  आशा से हम,
पूरे तन पर आस लपेटे,
छप छप फिरते बादल  से  बन !
सिकुड़ी अंगुली , भीगे माथे,
बाहर ठंडक भीतर ताप,
पत्तों पत्तों रात टपकती,
नींदें उड़ती होकर भाप !!
गलियारे के उस कोने पर,
कमर टिकाये मिलते थे ,
हाथों में कुछ चॉक के टुकड़े,
अंगुली बींच मसलते थे !!
अब आगंतुक उन सड़कों के,
जिनको नपा करते थे ,
आस के पंछी जैसे तुम हम,
चढ़ते और उतरते थे !! 
वो सब बीता ,बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा ,
साँसों साँसों बढ़ते जाते,
मैं भी ,वो भी ,और हम सब !
मन कहता है , यादें उसकी,
दाग़ लगे ,पीले काग़ज़ !!

!! चार !!

गली मुहल्ला सारा अपना,
इसके उसके, अपने काम,
प्रेम के बंधन सारे बंधन,
अपनापन और अपनी बात !
डोरी छूटी, होली बिखरी,
दीवाली की सिकुड़ी रात,
संबंधों ने सीमा ओढ़ी,
अपनेपन के ख़ाली हाथ !
बिखरे पत्ते शीशम के फिर,
कल की याद दिलाते है,
धुंध लपेटे शाम के जुगनू,
आँखों में जग जाते हैं,
रेल टिकट के काग़ज़ जैसा,
मूल्य, समय सब सीमित है,
कौन ,कहाँ ,कब याद आये,
अघोषित और असीमित है !
वो सब बीता ,बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा ,
साँसों साँसों बढ़ते जाते,
मैं भी ,वो भी ,और हम सब !
मन कहता है , यादें उसकी,
दाग़ लगे ,पीले काग़ज़ !!

!! पाँच  !!

रेल की  पटरी ,सूनी सड़कें,
लम्बी रातें खालीपन,
 अंधियारे मे राह ढूंढता,
मेरा ,उसका जब बचपन !
कदमो कदमो दूरी दिखती,
दिन प्रतिदिन कि चिन्ताएं ,
चारदिवारी घर कहलाता,
गर्भित होती आशाएँ !
ढिबरी मे कुछ हिलती डुलती,
अपनी छाया साथी सी,
बचपन के दिन, रातें अपनी,
जैसे दिया बाती सी !
तुम भी गुजरे मैं भी बीता,
इन गलियों चौराहों से,
मत रूठो ,मत बिछुडो बन्धु,
बांह ना छोडो बांहों से !
कहते कहते बीत गया सब,
सब कुछ बीता , बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा ,
सांसो सांसो, बढ़ते जाते ,
मैं भी वो भी और  हम सब !
मन कहता है , यादें उसकी,
दाग लगे पीले काग़ज़ !

!! छठा !! 

गौरैया का आना-जाना,
खिड़की से ,दरवाज़ों से,
मुझको ,तुमको उसे बुलाना ,
सतरंगी आवाज़ों से !
छूटी गलियाँ,दूर हुये सब,
पानी मिट्टी और चन्दन,
रोशनदान के तिनके बिखरे,
ख़्वाब हुआ सब अपनापन !
 इसको पूछें , उसको ढूंढें,
ये भी संभव हो जाता,
बीते कल की अमरलताएं,
चौराहे पर बो जाता !
यादें तो हैं , खुशबू सूखी,
इन कच्ची दीवारों से,
विस्तृत हो कर सिकुड़ गये हम,
अपने ही आकारों मे !

सब कुछ बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा,
सांसो सांसो, बढ़ते जाते ,
मैं भी वो भी और  हम सब !

मन कहता है , यादें उसकी,
दाग लगे पीले काग़ज़ !

!! सातवाँ  !!

काग़ज़ के कुछ महल  दो महले ,
पत्तों के कुछ बिछड़े गॉव,
चुटकी चुटकी धूप पिघलती,
बूंदों बूंदों ढलती छाँव !
अम्बर छूते ऊंचे घर में,
कोने कोने खालीपन,
शाम सवेरे का मुस्काना,
रिश्ते नातों का बंधन !
खेल खिलौने  गुड्डे गुड़िया,
जैसे सबकी उमर बढ़ी,
उनींदी आँखों के सपने,
जुड़ते जैसे कड़ी कड़ी !
फिर लगता है जैसे कुछ तो,
मेरा अपना छूट गया,
झरनो का वो अल्ल्हड़पन,
और झूम के गाना छूट गया !
सब कुछ बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा,
सांसो सांसो, बढ़ते जाते ,
मैं भी वो भी और  हम सब !

मन कहता है , यादें उसकी,
दाग लगे पीले काग़ज़ !

!! आठवाँ  !!

पीपल के कुछ सूखे पत्ते ,
और गुलाबी पंखुड़ियाँ ,
यांदें जिनसे झाँका करती,
बनी किताबें खिड़कियाँ  !
बीते दिन ,ज्योँ बिखरे पन्ने ,
उलटे  - सीधे अर्थ लिए,
आरोहण  - अवरोहण में  ही,
मैंने  ,तुमने व्यर्थ किये !
मिलना जुलना ऐसा जैसे ,
रेतीली सी पगडण्डी,
जिनपर चलते जुगनू से हम,
संध्या संध्या दूर हुए ! 

आ जाओ फिर कड़ियाँ जोड़ें ,
देखें क्या कुछ मिलता है ,
मन से रिसता रेशम क्या फिर ,
प्रेम ध्वजों को सिलता है  !
प्रतिउत्तर की आसें बीती,
ये मन गाना भूल गया , 
पलकें सूखीं सागर रीता ,
और ,लहराना भूल गया !

सब कुछ बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा,
सांसो सांसो, बढ़ते जाते ,
मैं भी वो भी और  हम सब !

मन कहता है , यादें उसकी,
दाग लगे पीले काग़ज़ !
 
!!नवाँ !!
 
बिखरे कितने महल दुमहले,
चटटानों से ख़्वाब ढहे,
आयु -आयु सरिता उफनी ,
संबंधों के ,बंध बहे !
ये भी टूटा , वो भी बिछड़ा ,
पत्ते -पत्ते बिखर गए !
 
पुनः समाहित करना जैसे,
अंजुली  - अंजुली रेत भरूँ ,
हर कोशिश में  यादों जैसा ,
तिनका  -तिनका फिर बिखरूँ !
 
 नीली कतरन , पीली कतरन,
गुड्डे गुड़ियों के कपडे,
गर्मी की वो ढलती शामें ,
गलियों में तैयारी सी,
दिन बीते और खुशबू सूखी,
फूलों की उन क्यारी की !
 
अनुबंधों से स्वप्न हो गए,
मेरी तेरी रातो के ,
और आँखों के प्याले रीते ,
अपनेपन की बातों के !
 
सब कुछ बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा,
सांसो सांसो, बढ़ते जाते ,
मैं भी वो भी और  हम सब !

मन कहता है , यादें उसकी,
दाग लगे पीले काग़ज़ !

                                              !! दसवाँ  !!
 
आते जाते मन की बातें,
उसके शब्द हमारी याद,
उससे मिलना ऐसा जैसे,
सुबह सवेरे वाले ख़्वाब !
 
कंधों पर, आकाश उठाये,
उड़ते फिरते गली गली,
रोज़ बनाते बंधन ऐसे,
जैसे जूते फीते स्वप्न !
शाम से रातें रात से सुबह,
कतरन कतरन सिली सिली !
 
पगडण्डी और गालियाँ बीती,
लम्बी चौड़ी राह बनी,
कन्धों कन्धों हाथ कहाँ अब,
आँखों आखों तना तनी !
 
आँगन आँगन दुनियाँ उतरी,
चौखट चौखट सीमाएँ,
अर्थ ढूंढती फिरती सारी,
मेरी तेरी आशाएँ !
 
सब कुछ बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा,
सांसो सांसो, बढ़ते जाते ,
मैं भी वो भी और  हम सब !

मन कहता है , यादें उसकी,
दाग लगे पीले काग़ज़ !
 
 


स्कूल के दिनों को केंद्रित कर के लिख रहा हूँ …… आगे जारी है  ……

Thursday, April 24, 2014

सूखता बरगद ,हरी कर देता है , यादें !

सूखता बरगद,
हरी कर देता है ,यादें !
जिसकी छाँव मे,
डगमगाते कदमों से,
स्कूल का पहला दिन !
लू चलती दोपहर में,
जिसकी छावं तले ,
इण्टर के रिज़ल्ट ,
का इंतज़ार !

सुबह , दोपहर,
शाम , रात ,
दिन प्रतिदिन,
साइकल से सकूटर,
फिर कार, 
सब समा जाते थे ,
उसकी छावं के फैलाव मे !
घर वहीँ ,वो वहीँ,
वही कमीज़ पहने,
नए नन्हे डगमगाते कदम,
मेरी अंगुली थामे,
पूछते हैं,
ये कौन है ,
जो छाँव नहीं देता ?
मैं और बरगद,
खो जाते हैं ,
अतीत के विस्तार में,
अशब्द,
आँखे नम किये !

सूखता बरगद,
हरी कर देता है , यादें !

Monday, April 21, 2014

टूटी सड़कें ...

टूटी सड़कें,
मुझे और आपको,
अकेला नहीं होने देतीं,
उदास होने पर,
राह दिखतीं है,
कुछ और टूटते हुए!

भोर में,
दिन की भीड़ में,
रात के सन्नाटे में,
आवाज़ें देती है,
पूछती हैं,
किस राह चले,
क्यों चले,
फिर  हम,
राह तलाश लेते हैं,
अकेला छोड़ देते हैं,
सडकों को, उदासी से,
कुछ और टूटने के लिए  !

Saturday, April 19, 2014

… क्योँकि ,कल बारिश थी !

… क्योँकि , कल बारिश थी !

कलियाँ , फूल,
पत्तियाँ और डालियाँ,
तृप्त हो गयीं,
मुस्कुराईं,
आँगन में ,
सड़कों पर,
गलियों में भी !
झुलसाती धूप,
उदास मायूस,
दुबकी थी बादलों में,
क्योकि ,कल बारिश थी !

कल ही वो भूखा सोया,
पत्तियाँ , काग़ज़ ,
लकड़ियाँ और सलाई,
जल ना सकीं !
आग तो जलती रही,
पेट में,
किन्तु ,आग ही,
जल न सकी रात भर,
तृप्ति के लिए,
क्योंकि ,कल बारिश थी !

Sunday, April 6, 2014

...उस रात वो नहीं था !!

कुछ सपने खिलखिलाते,
कुछ अपने मिलने आते ;
कुछ बातचीत होती,
कुछ फांसले मिटाती !
निष्प्राण तूलिकाएं,
कम्पित तरंग होतीं,
अफ़सोस वो नहीं था,
उस रात वो नहीं था !

वो डायरी का पन्ना,
उस रात लिखा जाता ;
मन जुगनू जगमगाते,
ऐ काश ,वो जो आता !
खामोश सीपियों में,
आनंद ,प्राण पता ;
अफ़सोस वो नहीं था,
उस रात वो नहीं था !

वो  रात महक जाती,
वो  रात चहक जाती  ;
आशाओं कि किताबें ,
उस रात बहक जाती  !
शब्दों  को अर्थ मिलते,
कुछ गीत ,गद्य खिलते ;
अफ़सोस वो नहीं था ,
उस रात वो नहीं था  !

:::   मनीष सिंह  

Thursday, April 3, 2014

एक कहानी : बॉम्बे कुल्फी !!

       "राजधानी एक्सप्रेस कोटा स्टेशन के प्लेटफॉर्म से धीरे-धीरे सरकने लगी थी ! अटेंडेट हाथों में आइस्क्रीम के कार्टन लिए बारी बारी से लकड़ी कि चम्मचों के साथ पूछ पूछ कर यात्रियों कि पसंद के फलेवर सर्व कर रहे थे ! "

बी6 कि साइड लोअर बर्थ पर बैठे आलोक से अटेंडंट ने उसकी पसन्द पूछी ? 

सर , आपके लिए कौन सी रखूँ ? 

आलोक लगभग कॉप सा गया ,अंतस कि उधेड़-बुन को जैसे बाहरी विराम मिले हों ! 

जैसे मंदिर में जलते दिये कि लौ अचानक आये हवा के झोंके से काँप उठती है !

अटेंडेंट : सर , आपका डिनर तो ठंडा हो चुका  है , लाइए में दूसरा ला देता हूँ !

आलोक ने मूक सहमति दी !

अटेंडेंट ने दूसरी गरम थाली ला कर आलोक के सामने रख दी और कहा :

सर , डिनर कीजिये मैं आइस्क्रीम सर्व कर के आता हूँ ! आप का कौन सा फलेवर रहेगा ? 

आलोक ने अनमने मन से कहा : कोई भी दे दो !

अंकल , पिंक वाली लीजिये बहुत अच्छी है ! सामने कि बर्थ पर बैठे परिवार कि बच्ची ने अपनी निष्काम राय दी !

          आलोक के विचलित और अधीर मन कि कम्पन को जैसे बच्ची कि आवाज़ से दो ठंडी हथेलियों का सहारा मिला हो ! उसने अपने दोनों हाथ फैला दिए बच्ची कि तरफ और बच्ची के रूप में असीम आनंद आलोक के गले से लिपट गया , बिना देर किये !

         किसी को नहीं पता , क्यों और कैसे ये रिश्ते बन जाते है सफ़र में , और क्यों और कैसे रिश्ते दरक भी जाते है अत्याधिक आशाओं के ताप से शायद , ज़िन्दगी के इस सफ़र में ही  !

          डबडबाई आँखों से आलोक ने आइस्क्रीम के कप को अपनी हथेलियों में रख लिया और बच्ची गौरैया सी चहकते हुए उसमे लकड़ी कि चम्मच डूबोने लगी ! आलोक भीतर तक तृप्त होता जा रहा था स्नेह और अपनत्व धारा से ! सालों हो गए थे अपने बेटे को गोद में उठाये अलोक को , अब तो गोद लायक नहीं होगा , उसकी अँगुली पकड़े भी बरसों बीते !

" दिशा " , अंकल को डिनर कर लेने दो , फिर चले जाना उनके पास ! बच्ची के पिता ने बच्ची से आग्रह किया !

दिशा  ठीक है कहते हुए अपनी बर्थ पर आ गयी !

आलोक ने डिनर किया और नाईट सूट ले कर टॉयलेट कि तरफ बढ़ा तो किसी ने आवाज़ लगाई :

" तुम कबीर ही होना ? "

आलोक अचंभित था अपने बचपन के नाम को सुन कर जिसे उसने कब का भुला दिया था माँ के जाने के बाद  !

हाँ , तुम कौन ? आलोक ने पुछा !

        कोच के भीतर रौशनी कम हो चली थी ! लोग ऊंघने लगे थे ! कुछ ने परदे भी सरका लिए थे जिस से रौशनी और कम हो जाती थी , चेहरे साफ़ साफ़ नहीं दिखते थे !

आलोक ने थोडा झुकते हुए उस आवाज़ वाली बर्थ कि तरफ हो कर फिर से पुछा : कौन हो तुम ?

मुझे साक़िब  कहते हैं कबीर साहब : आवाज़ लगाने वाले शख्स ने उठते हुए जवाब दिया !

आलोक के मुँह से कुछ भी नहीं निकल रहा था !

         मानो शब्द रास्ता भटक गए हों और ज़ुबान वाक्य बनाने के लिए दिमाग से गुहार लगा रही हो और आँखे सब कुछ देख कर इधर उधर ताक रही हो जैसे खुद से निगाहे चुरा लेना चाहती हो कि ऐसा भी हो सकता है, भला !

सम्भलते हुए आलोक बोला : अरे साक़िब आज मिले हो दोस्त ! कितना ढूँढा तुम्हे ! वो उधार कि कुल्फ़ी  याद है कि नहीं ?

साक़िब ने आलोक को बैठने को कहा ! दो पुराने दोस्त सालों बाद मिले थे !

आलोक ने साक़िब से दरवाज़े के पास चलने को कहा : भाई लोग सो रहे हैं !

साक़िब ने स्लीपर पहनते हुए चलने का इशारा किया !

साक़िब : क्या, कहाँ , कब से हो ?

आलोक : मुम्बई में एक बड़ी कंपनी में बड़ा अधिकारी हूँ !

साक़िब : 3rd  ए सी से क्यों ?

आलोक : कहीं नहीं मिला तो इस में ही आना पड़ा ,अमूमन ऐसे नहीं आता ! मुझे ट्रेन में चलना पसंद नहीं है !

सुनते ही , साक़िब ने अपने हाथों में लिया छोटा पेकेट धीरे से पीछे छुपाने कि कोशिश करी !

आलोक :  क्या छुपा रहे हो ?

साक़िब : कुछ नहीं , तुम्हे पसंद नहीं आएगा !

लेकिन ये है क्या कहते हुए आलोक ने साक़िब से ज़बरदस्ती पेकेट छीन लिया !

            छोटी चाय कि पत्ती कि खाली पोलिथीन में बंधे घर के बने कुछ नमकपारे और मठरी थी उस पेकेट में जिसे साक़िब कि पत्नी ने सफ़र के लिए दिया था साक़िब को और बड़े उत्साह से साक़िब ने सोचा था कि बरसों बाद मिले अपने बचपन के दोस्त को घर का पका कुछ खिलाएगा लेकिन उसके एक कथन से कि ट्रैन में  चलना उसको पसंद नहीं , से हिम्मत नहीं पड़ी और छुपाने कि कोशिश कर के भी नहीं छुपा सका !

आलोक  ने मठरी का एक टुकड़ा चखते हुए तारीफ में कहा : भाभी जी तो बहुत अच्छा पकाती है ! तभी साक़िब के फ़ोन कि घंटी बजी और बंद हो गयी !

आलोक : साक़िब सुन लो किसी कि मिस कॉल है !

साक़िब : हाँ वो वाइफ कि ही होगी , कर लूँगा बात अभी तुझ से तो मन भर लूं , ले तू नमकपारे खा !

इस बीच एक बार फिर घंटी बजी और बंद हो गयी !

इस बार आलोक ने साक़िब से कुछ कहा नहीं बस देखा !

साक़िब ने अपने फ़ोन में देखा दोनों बार उसके घर से ही फ़ोन था ! उसने कॉल बेक किया !

आपने डिनर किया पापा ? साक़िब के बेटे ने दूसरी तरफ से पुछा !

साक़िब के चेहरे पर खीची तनाव कि रेखाये अचानक ग़ायब हो चुकी थीं जो बार बार फ़ोन कि घंटी के बजने से बनी थीं आलोक से सामने ! घर के सब लोगो से बारी बरी से बात करते करते साक़िब आलोक को भूल चूका था !

          ट्रेन धीरे धीरे नागदा स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर लग रही थी ! राजधानी के आने से कोई सामान बेचने वाले भी आस पास नहीं आते , क्यों ट्रेन से सफ़र करने वालो ने न चाह कर भी अद्रश्य दूरी जो बना ली होती है , कूलीन होने  और बन जाने के बीच !

साक़िब ने आलोक कि तरफ देखा !

वो एकटक साक़िब के चहरे पर आते ख़ुशी के भाव और सन्तुष्टि से जीवन का आनंद लेता दिख रहा था !

ट्रेन प्लेटफॉर्म से सरक रही थी ! साक़िब ने अटेंडेंट से दो आइसक्रीम मांगी !

सर फलेवर तो सिर्फ एक ही है दोनों एक सी ही दे दूं ? अटेंडेंट ने झिझकते हुए कहा !

हाँ हाँ दो कोई भी दो : आलोक बोला !

आलोक ने साक़िब से पुछा : तुम क्या करते हो ?

साक़िब : एक पक्की नौकरी कि तलाश में हूँ ! अपने गाव से आई टी आई किया था !  गाव में ही एक दूकान पर काम करता रहा ! अब शहर में एक कंपनी के ऑथोरीज़ेड सर्विस सेंटर पर कॉन्ट्रैक्ट पर काम करता हूँ ! जहाँ भी काम होता है कंपनी भेजती है ! अभी बरोड़ा जा रहा हूँ ! कंपनी ने टिकट दिया तो राजधानी का सफ़र नसीब हुआ वर्ना कहाँ ये सब मेरे बूते में है ! दो बच्चे है और बीवी , कुछ ना कुछ कर के महीना चला लेता हूँ ! बच्चे पढ़ रहे है ! बस अपनी तो ये ही है ! सुबह निकला तो शाम को बच्चो के चेहरे देख कर सब भूल जाता हूँ !

ट्रेन रतलाम स्टेशन पर लग रही थी !

आलोक : आ चल एक एक कुल्फी खाते हैं ! यहाँ का स्टॉपेज ज़यादा है , मुझे पता है !

दोनों रतलाम स्टेशन पर आधी रात के वक़्त कुल्फी खा रहे थे और खो गए पुरानी यादों में ! 

       क़बीर इतनी दोपहर में कहाँ जा रहे हो ? सात आठ साल के कबीर से उसकी माँ ने दरवाज़े से बहार निकलते हुए पुकारा !

       कबीर बचपन में गर्मियों कि छुट्टियों में अपनी नानी के घर जाया करता था ! वहीँ साक़िब उसका दोस्त हुआ ! दोपहर में धुल उड़ाती लू और नीम के पेड़ के नीचे " बॉम्बे कुल्फी " के नाम से गाव का ही एक लड़का अपनी जादुई पेटी को ठेले पर  लिए गॉव भर में घूम घूम कर कुल्फी बेचता था ! तेज़ धुप में कुल्फी खाते दोस्त जीवन के उतार चढ़ाव से अनजान धूल भरी पगडंडियों से खेत खेत घूम आते थे ! समय बीता , कबीर का गाव आना कम होता गया और शहर के बड़े स्कूल में दाखिले के वक़्त कबीर आलोक हो गया और साक़िब गाव के ही आई टी आई में दाखिल !

आलोक : तू मेरे साथ चल , दिल्ली !

साक़िब : कहाँ जा सकूंगा ! खैर घर पर कौन कोन है तेरे ?

आलोक : मेरे घर पर मुझे कोई मठरी और नमकपारे बना कर देने वाला नहीं है ! कोई नहीं है जो मेरे रात के खाने कि खबर ले ! कोई नहीं है जो मुझे से रात कि सलामती कि दुआ ले या दे ! दरअसल में किसी घर में रहता ही नहीं हूँ ! मैं तो ईंट पत्थरों के मकान में रहता हूँ ! कभी घर था ये भी पर बीवी बच्चो के चले जाने के बाद अब नहीं है !  

साक़िब हैरत से सब सुन और देख रहा था ! दोनों ट्रेन के सरकने के साथ उस पर चढ़ गए ! ट्रेन अपनी पूरी रफ़्तार पर थी और आलोक अभी शुरुआत भी नहीं कर सका था जीवन के सफ़र कि , ऐसा साक़िब समझ रहा था !!

ट्रेन बरोडा स्टेशन पर खड़ी थी !

साक़िब ने झिझकते हुए आलोक से कहा : कबीर अगर तू मेरे साथ मेरे घर चलता तो अच्छा था !

कबीर को जैसे ऐसे ही अनुरोध कि आशा थी !

अगले दिन कि रात को कबीर कि गोद में बैठा साक़िब का बेटा डिनर करते हुए केह रहा था :  चाचा आज खाने के बाद आइसक्रीम खाने चलेंगे , चौराहे पर " बॉम्बे कुल्फी " वाले के पास !

साक़िब : यहाँ भी एक उसी नाम का कुल्फी वाला है , खूब भीड़ होती है गर्मियों में शाम के वक़्त !

कबीर ने हाँ बेटा कहते हुए सफ़ेद रुमाल से भीगी पलकें पोंछ लीं और बोला : और कल चलेंगे आपकी चाची और कमल को लेने !

साक़िब का बेटा : हाँ चाचा , अब बहुत दिन हुए !

साक़िब के बेटे ने एक बड़ी बात कह दी थी !

        असंख्य उत्तर असंख्य सवालों के आने से पहले दिए जा चुके थे आलोक के द्वारा ! पिघलती कुल्फी से चिपकती उँगलियों कि  गुफ्तगू कई कहानियाँ  कहती  थीं, तो रात के सन्नाटे गुपचुप पलकों के नीचे छुपी बूंदो में आहिस्ता-आहिस्ता सब सुनते जाते थे !

एक कहानी : बॉम्बे कुल्फी !