Sunday, April 27, 2014

मन कहता है यादें उसकी ,दाग़ लगे ,पीले काग़ज़ !!

!! एक !!
मन कहता है यादें उसकी ,
दाग़ लगे  ,पीले काग़ज़ !

सूनी क्लासें,लम्बी गलियां,
तन्हाई में अपनापन,
खिड़की उसकी धुप घोलती,
आँखों में स्याही चन्दन !
जबतक समझे स्नेह नेह ये,
समझ बढ़ी और दूर हुए,
पानी उतरा आँखों से कुछ,
होठों ने भी शब्द छुए !!
नहर किनारे बूढा पीपल,
आस लिए कुछ कहता है,
फिर गूँजेंगीं  नेह किताबें,
और उछलेंगे वो काग़ज़ !
वो सब बीता , बीता गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा !
साँसों साँसों बढ़ते जाते,
मैं भी ,वो भी ,और  हम सब ,
मन कहता है यादें उसकी ,
दाग़ लगे ,पीले काग़ज़ !



!! दो !!

जलते बुझते लैम्प सरीखे,
रात से दिन और दिन से रात,
कई किताबें ,खाली पन्ने,
लाखों शब्द अधूरी बात !
हलके हलके बढ़ता जाता,
एक  नशा , एकांकीपन,
जैसे मुझको उसको भी हो,
बस मेरा ,मेरा बन्धन !!
टुकड़े टुकड़े जुड़ते जाते,
जीवन के कुछ गहरे सत्य,
पंक्ति में फिर अंतिम दिखते,
यौवन के वो अगले कृत्य !!
मन का कोना ऐसा जैसे,
भरी दुपहरी खाली घर,
कितना कुछ करने की चाहत,
नहीं नियंत्रण ,पर ,मन पर !!
वो सब बीता ,बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा ,
साँसों साँसों बढ़ते जाते,
मैं भी ,वो भी ,और हम सब !
मन कहता है , यादें उसकी,
दाग़ लगे ,पीले काग़ज़ !!

!! तीन !!

गलियों गलियों  बारिश बारिश,
कश्ती कश्ती  आशा से हम,
पूरे तन पर आस लपेटे,
छप छप फिरते बादल  से  बन !
सिकुड़ी अंगुली , भीगे माथे,
बाहर ठंडक भीतर ताप,
पत्तों पत्तों रात टपकती,
नींदें उड़ती होकर भाप !!
गलियारे के उस कोने पर,
कमर टिकाये मिलते थे ,
हाथों में कुछ चॉक के टुकड़े,
अंगुली बींच मसलते थे !!
अब आगंतुक उन सड़कों के,
जिनको नपा करते थे ,
आस के पंछी जैसे तुम हम,
चढ़ते और उतरते थे !! 
वो सब बीता ,बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा ,
साँसों साँसों बढ़ते जाते,
मैं भी ,वो भी ,और हम सब !
मन कहता है , यादें उसकी,
दाग़ लगे ,पीले काग़ज़ !!

!! चार !!

गली मुहल्ला सारा अपना,
इसके उसके, अपने काम,
प्रेम के बंधन सारे बंधन,
अपनापन और अपनी बात !
डोरी छूटी, होली बिखरी,
दीवाली की सिकुड़ी रात,
संबंधों ने सीमा ओढ़ी,
अपनेपन के ख़ाली हाथ !
बिखरे पत्ते शीशम के फिर,
कल की याद दिलाते है,
धुंध लपेटे शाम के जुगनू,
आँखों में जग जाते हैं,
रेल टिकट के काग़ज़ जैसा,
मूल्य, समय सब सीमित है,
कौन ,कहाँ ,कब याद आये,
अघोषित और असीमित है !
वो सब बीता ,बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा ,
साँसों साँसों बढ़ते जाते,
मैं भी ,वो भी ,और हम सब !
मन कहता है , यादें उसकी,
दाग़ लगे ,पीले काग़ज़ !!

!! पाँच  !!

रेल की  पटरी ,सूनी सड़कें,
लम्बी रातें खालीपन,
 अंधियारे मे राह ढूंढता,
मेरा ,उसका जब बचपन !
कदमो कदमो दूरी दिखती,
दिन प्रतिदिन कि चिन्ताएं ,
चारदिवारी घर कहलाता,
गर्भित होती आशाएँ !
ढिबरी मे कुछ हिलती डुलती,
अपनी छाया साथी सी,
बचपन के दिन, रातें अपनी,
जैसे दिया बाती सी !
तुम भी गुजरे मैं भी बीता,
इन गलियों चौराहों से,
मत रूठो ,मत बिछुडो बन्धु,
बांह ना छोडो बांहों से !
कहते कहते बीत गया सब,
सब कुछ बीता , बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा ,
सांसो सांसो, बढ़ते जाते ,
मैं भी वो भी और  हम सब !
मन कहता है , यादें उसकी,
दाग लगे पीले काग़ज़ !

!! छठा !! 

गौरैया का आना-जाना,
खिड़की से ,दरवाज़ों से,
मुझको ,तुमको उसे बुलाना ,
सतरंगी आवाज़ों से !
छूटी गलियाँ,दूर हुये सब,
पानी मिट्टी और चन्दन,
रोशनदान के तिनके बिखरे,
ख़्वाब हुआ सब अपनापन !
 इसको पूछें , उसको ढूंढें,
ये भी संभव हो जाता,
बीते कल की अमरलताएं,
चौराहे पर बो जाता !
यादें तो हैं , खुशबू सूखी,
इन कच्ची दीवारों से,
विस्तृत हो कर सिकुड़ गये हम,
अपने ही आकारों मे !

सब कुछ बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा,
सांसो सांसो, बढ़ते जाते ,
मैं भी वो भी और  हम सब !

मन कहता है , यादें उसकी,
दाग लगे पीले काग़ज़ !

!! सातवाँ  !!

काग़ज़ के कुछ महल  दो महले ,
पत्तों के कुछ बिछड़े गॉव,
चुटकी चुटकी धूप पिघलती,
बूंदों बूंदों ढलती छाँव !
अम्बर छूते ऊंचे घर में,
कोने कोने खालीपन,
शाम सवेरे का मुस्काना,
रिश्ते नातों का बंधन !
खेल खिलौने  गुड्डे गुड़िया,
जैसे सबकी उमर बढ़ी,
उनींदी आँखों के सपने,
जुड़ते जैसे कड़ी कड़ी !
फिर लगता है जैसे कुछ तो,
मेरा अपना छूट गया,
झरनो का वो अल्ल्हड़पन,
और झूम के गाना छूट गया !
सब कुछ बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा,
सांसो सांसो, बढ़ते जाते ,
मैं भी वो भी और  हम सब !

मन कहता है , यादें उसकी,
दाग लगे पीले काग़ज़ !

!! आठवाँ  !!

पीपल के कुछ सूखे पत्ते ,
और गुलाबी पंखुड़ियाँ ,
यांदें जिनसे झाँका करती,
बनी किताबें खिड़कियाँ  !
बीते दिन ,ज्योँ बिखरे पन्ने ,
उलटे  - सीधे अर्थ लिए,
आरोहण  - अवरोहण में  ही,
मैंने  ,तुमने व्यर्थ किये !
मिलना जुलना ऐसा जैसे ,
रेतीली सी पगडण्डी,
जिनपर चलते जुगनू से हम,
संध्या संध्या दूर हुए ! 

आ जाओ फिर कड़ियाँ जोड़ें ,
देखें क्या कुछ मिलता है ,
मन से रिसता रेशम क्या फिर ,
प्रेम ध्वजों को सिलता है  !
प्रतिउत्तर की आसें बीती,
ये मन गाना भूल गया , 
पलकें सूखीं सागर रीता ,
और ,लहराना भूल गया !

सब कुछ बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा,
सांसो सांसो, बढ़ते जाते ,
मैं भी वो भी और  हम सब !

मन कहता है , यादें उसकी,
दाग लगे पीले काग़ज़ !
 
!!नवाँ !!
 
बिखरे कितने महल दुमहले,
चटटानों से ख़्वाब ढहे,
आयु -आयु सरिता उफनी ,
संबंधों के ,बंध बहे !
ये भी टूटा , वो भी बिछड़ा ,
पत्ते -पत्ते बिखर गए !
 
पुनः समाहित करना जैसे,
अंजुली  - अंजुली रेत भरूँ ,
हर कोशिश में  यादों जैसा ,
तिनका  -तिनका फिर बिखरूँ !
 
 नीली कतरन , पीली कतरन,
गुड्डे गुड़ियों के कपडे,
गर्मी की वो ढलती शामें ,
गलियों में तैयारी सी,
दिन बीते और खुशबू सूखी,
फूलों की उन क्यारी की !
 
अनुबंधों से स्वप्न हो गए,
मेरी तेरी रातो के ,
और आँखों के प्याले रीते ,
अपनेपन की बातों के !
 
सब कुछ बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा,
सांसो सांसो, बढ़ते जाते ,
मैं भी वो भी और  हम सब !

मन कहता है , यादें उसकी,
दाग लगे पीले काग़ज़ !

                                              !! दसवाँ  !!
 
आते जाते मन की बातें,
उसके शब्द हमारी याद,
उससे मिलना ऐसा जैसे,
सुबह सवेरे वाले ख़्वाब !
 
कंधों पर, आकाश उठाये,
उड़ते फिरते गली गली,
रोज़ बनाते बंधन ऐसे,
जैसे जूते फीते स्वप्न !
शाम से रातें रात से सुबह,
कतरन कतरन सिली सिली !
 
पगडण्डी और गालियाँ बीती,
लम्बी चौड़ी राह बनी,
कन्धों कन्धों हाथ कहाँ अब,
आँखों आखों तना तनी !
 
आँगन आँगन दुनियाँ उतरी,
चौखट चौखट सीमाएँ,
अर्थ ढूंढती फिरती सारी,
मेरी तेरी आशाएँ !
 
सब कुछ बीत गया सब,
कहाँ लौट कर आएगा,
सांसो सांसो, बढ़ते जाते ,
मैं भी वो भी और  हम सब !

मन कहता है , यादें उसकी,
दाग लगे पीले काग़ज़ !
 
 


स्कूल के दिनों को केंद्रित कर के लिख रहा हूँ …… आगे जारी है  ……

Thursday, April 24, 2014

सूखता बरगद ,हरी कर देता है , यादें !

सूखता बरगद,
हरी कर देता है ,यादें !
जिसकी छाँव मे,
डगमगाते कदमों से,
स्कूल का पहला दिन !
लू चलती दोपहर में,
जिसकी छावं तले ,
इण्टर के रिज़ल्ट ,
का इंतज़ार !

सुबह , दोपहर,
शाम , रात ,
दिन प्रतिदिन,
साइकल से सकूटर,
फिर कार, 
सब समा जाते थे ,
उसकी छावं के फैलाव मे !
घर वहीँ ,वो वहीँ,
वही कमीज़ पहने,
नए नन्हे डगमगाते कदम,
मेरी अंगुली थामे,
पूछते हैं,
ये कौन है ,
जो छाँव नहीं देता ?
मैं और बरगद,
खो जाते हैं ,
अतीत के विस्तार में,
अशब्द,
आँखे नम किये !

सूखता बरगद,
हरी कर देता है , यादें !

Monday, April 21, 2014

टूटी सड़कें ...

टूटी सड़कें,
मुझे और आपको,
अकेला नहीं होने देतीं,
उदास होने पर,
राह दिखतीं है,
कुछ और टूटते हुए!

भोर में,
दिन की भीड़ में,
रात के सन्नाटे में,
आवाज़ें देती है,
पूछती हैं,
किस राह चले,
क्यों चले,
फिर  हम,
राह तलाश लेते हैं,
अकेला छोड़ देते हैं,
सडकों को, उदासी से,
कुछ और टूटने के लिए  !

Saturday, April 19, 2014

… क्योँकि ,कल बारिश थी !

… क्योँकि , कल बारिश थी !

कलियाँ , फूल,
पत्तियाँ और डालियाँ,
तृप्त हो गयीं,
मुस्कुराईं,
आँगन में ,
सड़कों पर,
गलियों में भी !
झुलसाती धूप,
उदास मायूस,
दुबकी थी बादलों में,
क्योकि ,कल बारिश थी !

कल ही वो भूखा सोया,
पत्तियाँ , काग़ज़ ,
लकड़ियाँ और सलाई,
जल ना सकीं !
आग तो जलती रही,
पेट में,
किन्तु ,आग ही,
जल न सकी रात भर,
तृप्ति के लिए,
क्योंकि ,कल बारिश थी !

Sunday, April 6, 2014

...उस रात वो नहीं था !!

कुछ सपने खिलखिलाते,
कुछ अपने मिलने आते ;
कुछ बातचीत होती,
कुछ फांसले मिटाती !
निष्प्राण तूलिकाएं,
कम्पित तरंग होतीं,
अफ़सोस वो नहीं था,
उस रात वो नहीं था !

वो डायरी का पन्ना,
उस रात लिखा जाता ;
मन जुगनू जगमगाते,
ऐ काश ,वो जो आता !
खामोश सीपियों में,
आनंद ,प्राण पता ;
अफ़सोस वो नहीं था,
उस रात वो नहीं था !

वो  रात महक जाती,
वो  रात चहक जाती  ;
आशाओं कि किताबें ,
उस रात बहक जाती  !
शब्दों  को अर्थ मिलते,
कुछ गीत ,गद्य खिलते ;
अफ़सोस वो नहीं था ,
उस रात वो नहीं था  !

:::   मनीष सिंह  

Thursday, April 3, 2014

एक कहानी : बॉम्बे कुल्फी !!

       "राजधानी एक्सप्रेस कोटा स्टेशन के प्लेटफॉर्म से धीरे-धीरे सरकने लगी थी ! अटेंडेट हाथों में आइस्क्रीम के कार्टन लिए बारी बारी से लकड़ी कि चम्मचों के साथ पूछ पूछ कर यात्रियों कि पसंद के फलेवर सर्व कर रहे थे ! "

बी6 कि साइड लोअर बर्थ पर बैठे आलोक से अटेंडंट ने उसकी पसन्द पूछी ? 

सर , आपके लिए कौन सी रखूँ ? 

आलोक लगभग कॉप सा गया ,अंतस कि उधेड़-बुन को जैसे बाहरी विराम मिले हों ! 

जैसे मंदिर में जलते दिये कि लौ अचानक आये हवा के झोंके से काँप उठती है !

अटेंडेंट : सर , आपका डिनर तो ठंडा हो चुका  है , लाइए में दूसरा ला देता हूँ !

आलोक ने मूक सहमति दी !

अटेंडेंट ने दूसरी गरम थाली ला कर आलोक के सामने रख दी और कहा :

सर , डिनर कीजिये मैं आइस्क्रीम सर्व कर के आता हूँ ! आप का कौन सा फलेवर रहेगा ? 

आलोक ने अनमने मन से कहा : कोई भी दे दो !

अंकल , पिंक वाली लीजिये बहुत अच्छी है ! सामने कि बर्थ पर बैठे परिवार कि बच्ची ने अपनी निष्काम राय दी !

          आलोक के विचलित और अधीर मन कि कम्पन को जैसे बच्ची कि आवाज़ से दो ठंडी हथेलियों का सहारा मिला हो ! उसने अपने दोनों हाथ फैला दिए बच्ची कि तरफ और बच्ची के रूप में असीम आनंद आलोक के गले से लिपट गया , बिना देर किये !

         किसी को नहीं पता , क्यों और कैसे ये रिश्ते बन जाते है सफ़र में , और क्यों और कैसे रिश्ते दरक भी जाते है अत्याधिक आशाओं के ताप से शायद , ज़िन्दगी के इस सफ़र में ही  !

          डबडबाई आँखों से आलोक ने आइस्क्रीम के कप को अपनी हथेलियों में रख लिया और बच्ची गौरैया सी चहकते हुए उसमे लकड़ी कि चम्मच डूबोने लगी ! आलोक भीतर तक तृप्त होता जा रहा था स्नेह और अपनत्व धारा से ! सालों हो गए थे अपने बेटे को गोद में उठाये अलोक को , अब तो गोद लायक नहीं होगा , उसकी अँगुली पकड़े भी बरसों बीते !

" दिशा " , अंकल को डिनर कर लेने दो , फिर चले जाना उनके पास ! बच्ची के पिता ने बच्ची से आग्रह किया !

दिशा  ठीक है कहते हुए अपनी बर्थ पर आ गयी !

आलोक ने डिनर किया और नाईट सूट ले कर टॉयलेट कि तरफ बढ़ा तो किसी ने आवाज़ लगाई :

" तुम कबीर ही होना ? "

आलोक अचंभित था अपने बचपन के नाम को सुन कर जिसे उसने कब का भुला दिया था माँ के जाने के बाद  !

हाँ , तुम कौन ? आलोक ने पुछा !

        कोच के भीतर रौशनी कम हो चली थी ! लोग ऊंघने लगे थे ! कुछ ने परदे भी सरका लिए थे जिस से रौशनी और कम हो जाती थी , चेहरे साफ़ साफ़ नहीं दिखते थे !

आलोक ने थोडा झुकते हुए उस आवाज़ वाली बर्थ कि तरफ हो कर फिर से पुछा : कौन हो तुम ?

मुझे साक़िब  कहते हैं कबीर साहब : आवाज़ लगाने वाले शख्स ने उठते हुए जवाब दिया !

आलोक के मुँह से कुछ भी नहीं निकल रहा था !

         मानो शब्द रास्ता भटक गए हों और ज़ुबान वाक्य बनाने के लिए दिमाग से गुहार लगा रही हो और आँखे सब कुछ देख कर इधर उधर ताक रही हो जैसे खुद से निगाहे चुरा लेना चाहती हो कि ऐसा भी हो सकता है, भला !

सम्भलते हुए आलोक बोला : अरे साक़िब आज मिले हो दोस्त ! कितना ढूँढा तुम्हे ! वो उधार कि कुल्फ़ी  याद है कि नहीं ?

साक़िब ने आलोक को बैठने को कहा ! दो पुराने दोस्त सालों बाद मिले थे !

आलोक ने साक़िब से दरवाज़े के पास चलने को कहा : भाई लोग सो रहे हैं !

साक़िब ने स्लीपर पहनते हुए चलने का इशारा किया !

साक़िब : क्या, कहाँ , कब से हो ?

आलोक : मुम्बई में एक बड़ी कंपनी में बड़ा अधिकारी हूँ !

साक़िब : 3rd  ए सी से क्यों ?

आलोक : कहीं नहीं मिला तो इस में ही आना पड़ा ,अमूमन ऐसे नहीं आता ! मुझे ट्रेन में चलना पसंद नहीं है !

सुनते ही , साक़िब ने अपने हाथों में लिया छोटा पेकेट धीरे से पीछे छुपाने कि कोशिश करी !

आलोक :  क्या छुपा रहे हो ?

साक़िब : कुछ नहीं , तुम्हे पसंद नहीं आएगा !

लेकिन ये है क्या कहते हुए आलोक ने साक़िब से ज़बरदस्ती पेकेट छीन लिया !

            छोटी चाय कि पत्ती कि खाली पोलिथीन में बंधे घर के बने कुछ नमकपारे और मठरी थी उस पेकेट में जिसे साक़िब कि पत्नी ने सफ़र के लिए दिया था साक़िब को और बड़े उत्साह से साक़िब ने सोचा था कि बरसों बाद मिले अपने बचपन के दोस्त को घर का पका कुछ खिलाएगा लेकिन उसके एक कथन से कि ट्रैन में  चलना उसको पसंद नहीं , से हिम्मत नहीं पड़ी और छुपाने कि कोशिश कर के भी नहीं छुपा सका !

आलोक  ने मठरी का एक टुकड़ा चखते हुए तारीफ में कहा : भाभी जी तो बहुत अच्छा पकाती है ! तभी साक़िब के फ़ोन कि घंटी बजी और बंद हो गयी !

आलोक : साक़िब सुन लो किसी कि मिस कॉल है !

साक़िब : हाँ वो वाइफ कि ही होगी , कर लूँगा बात अभी तुझ से तो मन भर लूं , ले तू नमकपारे खा !

इस बीच एक बार फिर घंटी बजी और बंद हो गयी !

इस बार आलोक ने साक़िब से कुछ कहा नहीं बस देखा !

साक़िब ने अपने फ़ोन में देखा दोनों बार उसके घर से ही फ़ोन था ! उसने कॉल बेक किया !

आपने डिनर किया पापा ? साक़िब के बेटे ने दूसरी तरफ से पुछा !

साक़िब के चेहरे पर खीची तनाव कि रेखाये अचानक ग़ायब हो चुकी थीं जो बार बार फ़ोन कि घंटी के बजने से बनी थीं आलोक से सामने ! घर के सब लोगो से बारी बरी से बात करते करते साक़िब आलोक को भूल चूका था !

          ट्रेन धीरे धीरे नागदा स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर लग रही थी ! राजधानी के आने से कोई सामान बेचने वाले भी आस पास नहीं आते , क्यों ट्रेन से सफ़र करने वालो ने न चाह कर भी अद्रश्य दूरी जो बना ली होती है , कूलीन होने  और बन जाने के बीच !

साक़िब ने आलोक कि तरफ देखा !

वो एकटक साक़िब के चहरे पर आते ख़ुशी के भाव और सन्तुष्टि से जीवन का आनंद लेता दिख रहा था !

ट्रेन प्लेटफॉर्म से सरक रही थी ! साक़िब ने अटेंडेंट से दो आइसक्रीम मांगी !

सर फलेवर तो सिर्फ एक ही है दोनों एक सी ही दे दूं ? अटेंडेंट ने झिझकते हुए कहा !

हाँ हाँ दो कोई भी दो : आलोक बोला !

आलोक ने साक़िब से पुछा : तुम क्या करते हो ?

साक़िब : एक पक्की नौकरी कि तलाश में हूँ ! अपने गाव से आई टी आई किया था !  गाव में ही एक दूकान पर काम करता रहा ! अब शहर में एक कंपनी के ऑथोरीज़ेड सर्विस सेंटर पर कॉन्ट्रैक्ट पर काम करता हूँ ! जहाँ भी काम होता है कंपनी भेजती है ! अभी बरोड़ा जा रहा हूँ ! कंपनी ने टिकट दिया तो राजधानी का सफ़र नसीब हुआ वर्ना कहाँ ये सब मेरे बूते में है ! दो बच्चे है और बीवी , कुछ ना कुछ कर के महीना चला लेता हूँ ! बच्चे पढ़ रहे है ! बस अपनी तो ये ही है ! सुबह निकला तो शाम को बच्चो के चेहरे देख कर सब भूल जाता हूँ !

ट्रेन रतलाम स्टेशन पर लग रही थी !

आलोक : आ चल एक एक कुल्फी खाते हैं ! यहाँ का स्टॉपेज ज़यादा है , मुझे पता है !

दोनों रतलाम स्टेशन पर आधी रात के वक़्त कुल्फी खा रहे थे और खो गए पुरानी यादों में ! 

       क़बीर इतनी दोपहर में कहाँ जा रहे हो ? सात आठ साल के कबीर से उसकी माँ ने दरवाज़े से बहार निकलते हुए पुकारा !

       कबीर बचपन में गर्मियों कि छुट्टियों में अपनी नानी के घर जाया करता था ! वहीँ साक़िब उसका दोस्त हुआ ! दोपहर में धुल उड़ाती लू और नीम के पेड़ के नीचे " बॉम्बे कुल्फी " के नाम से गाव का ही एक लड़का अपनी जादुई पेटी को ठेले पर  लिए गॉव भर में घूम घूम कर कुल्फी बेचता था ! तेज़ धुप में कुल्फी खाते दोस्त जीवन के उतार चढ़ाव से अनजान धूल भरी पगडंडियों से खेत खेत घूम आते थे ! समय बीता , कबीर का गाव आना कम होता गया और शहर के बड़े स्कूल में दाखिले के वक़्त कबीर आलोक हो गया और साक़िब गाव के ही आई टी आई में दाखिल !

आलोक : तू मेरे साथ चल , दिल्ली !

साक़िब : कहाँ जा सकूंगा ! खैर घर पर कौन कोन है तेरे ?

आलोक : मेरे घर पर मुझे कोई मठरी और नमकपारे बना कर देने वाला नहीं है ! कोई नहीं है जो मेरे रात के खाने कि खबर ले ! कोई नहीं है जो मुझे से रात कि सलामती कि दुआ ले या दे ! दरअसल में किसी घर में रहता ही नहीं हूँ ! मैं तो ईंट पत्थरों के मकान में रहता हूँ ! कभी घर था ये भी पर बीवी बच्चो के चले जाने के बाद अब नहीं है !  

साक़िब हैरत से सब सुन और देख रहा था ! दोनों ट्रेन के सरकने के साथ उस पर चढ़ गए ! ट्रेन अपनी पूरी रफ़्तार पर थी और आलोक अभी शुरुआत भी नहीं कर सका था जीवन के सफ़र कि , ऐसा साक़िब समझ रहा था !!

ट्रेन बरोडा स्टेशन पर खड़ी थी !

साक़िब ने झिझकते हुए आलोक से कहा : कबीर अगर तू मेरे साथ मेरे घर चलता तो अच्छा था !

कबीर को जैसे ऐसे ही अनुरोध कि आशा थी !

अगले दिन कि रात को कबीर कि गोद में बैठा साक़िब का बेटा डिनर करते हुए केह रहा था :  चाचा आज खाने के बाद आइसक्रीम खाने चलेंगे , चौराहे पर " बॉम्बे कुल्फी " वाले के पास !

साक़िब : यहाँ भी एक उसी नाम का कुल्फी वाला है , खूब भीड़ होती है गर्मियों में शाम के वक़्त !

कबीर ने हाँ बेटा कहते हुए सफ़ेद रुमाल से भीगी पलकें पोंछ लीं और बोला : और कल चलेंगे आपकी चाची और कमल को लेने !

साक़िब का बेटा : हाँ चाचा , अब बहुत दिन हुए !

साक़िब के बेटे ने एक बड़ी बात कह दी थी !

        असंख्य उत्तर असंख्य सवालों के आने से पहले दिए जा चुके थे आलोक के द्वारा ! पिघलती कुल्फी से चिपकती उँगलियों कि  गुफ्तगू कई कहानियाँ  कहती  थीं, तो रात के सन्नाटे गुपचुप पलकों के नीचे छुपी बूंदो में आहिस्ता-आहिस्ता सब सुनते जाते थे !

एक कहानी : बॉम्बे कुल्फी !

Monday, March 31, 2014

केवल, रोटियों के लिए !!

वो रोज़,
अंगीठी कि आँच पर,
नुक्कड़ नुक्कड़,
गलियों गलियों,
पराठे पकाता है,
रोटियों के लिए !

और ,वो भी,
रोज़, भटकता है,
दफ्तरों-दफ्तरों,
डिग्रियाँ लिए,
उम्मीदों  पर !

अंततः
कच्चे कोयले सा,
ज़रूरतों,
ज़िम्मेदारियों,
कि अंगीठी में,
खुद को पकता पाता है,
केवल,
रोटियों के लिए !!

:: मनीष सिंह ::