Wednesday, April 3, 2013

गुलमोहर से तटस्थ, शैली में !!

गुलमोहर !!

कतारों में,
पहाड़ियों पर,
झील के किनारे,
बिना सुगंध,
    मुस्कुराते हैं !
समर्पण,
खुशबु सा,
रहता है,
संबंधों में!
हम जीते है,
रहते है,
उनके साथ भी,
जो मुस्कुराते है,
गुलमोहर से,
तटस्थ,
शैली में !

                                                                --: मनीष सिंह

Tuesday, April 2, 2013

परछाईयाँ, आकार लेती हैं !

परछाईयाँ,
आकार लेती हैं,
उत्तम अवरोधों से,
प्रकाश की राह में,
उत्कृष्ट होती हुईं !

जैसे दीखती हैं,
आजकल,
नए सत्र में,
नवीन कोपलें,
गलियों में,
सड़कों पर,
मैदानों में,
बस्ता,
पानी की बोतल,
थामें, स्कूल,
जाती हुईं ,  आकार लेने को !!


Saturday, March 30, 2013

संतोष,दो किनारों पर प्रतीक्षित ही रहता है !!

कहानी से,
हो जाते हैं !
जीवन !
जो मिलते हैं,
हमसे,
आपसे,
चाहकर,
ना चाहकर भी  !
कभी कभी,
इच्छाएं
पूरी न हों,
तो भी,
दूरियां,
हो जाती है !
और कहानियां
जन्म लेती हैं ...किन्तु
संतोष,
दो किनारों पर,
प्रतीक्षित ही
रहता है !!

Monday, March 25, 2013

पगडण्डीयां !

पगडण्डीयां,


मिलाती है,

कूँए से,

झोंपड़ों से,

खेतों से,

सहते हुए,

तपिश,

बारिश,

कटाव,

किनारों का,

सम्बंधित,

रहने के लिए !!

Sunday, March 24, 2013

रंगों की अब, परत चढाओ,

वर्ष  बीता,
बीत  गए,
रात  और दिन,
उतर गए  गए,
सब कलेवर,
माध्यम उनकी,
होती गयी,
रोशनी,
बेरंगी से,
सारे रिश्ते,
और सम्बन्ध !
होली आई,
आलोकों के,
अनुरागों के,
करुणा के भी,
लाल , गुलाबी,
हरे, नारंगी,
रंगों की अब,
परत चढाओ,
संबंधों में,
रंग मिलाओ,
होली मनाओ !!

Friday, March 22, 2013

" गौरैया " रेशमी धागों सी ......

" गौरैया "


रेशमी धागों सी,
लहराती, फुदकती!
आंगन में,
दीवार पर,
पंखे के खोल में,
रोशनदान से,
उतरती,
कहती रहती,
जीवन तभी है,
जब समिप्प्य हो,
स्नेह हो,
सहयोग हो,
आदर हो !

अब,कम आती है,
थाली से,चावल
सब्जी, दाल,
चुगने को,
दूर हो गयी वो !
दीवारों ने कम
कर दिया,
आपसी सौहाद्र
  एक परिवार में !!
                                                                                                     --::-- मनीष सिंह --::--

Thursday, March 21, 2013

... आग्रह करते दिन, परिपक्कव् होती रातें !!

कितनी भोरें,
कितनी शामें,
कितनी रातें,
कितने दिन,
और साथ,
     रहेंगी !!

गुल्लक टूटी,
गुडिया छूटी,
संभव मन,
संबंधों में बदले !
बचपन से,
आग्रह करते दिन,
परिपक्कव् होती रातें,
सतत,
परिपूर्ण भोर,
निर्मित करती हैं !!


                                 <>< Manish Singh ><>