योगेश का लिखा एक गीत है ....आनंद फिल्म का " कही दूर जब दिन ढल जाए..." इस गीत के आरंभ होने रे पहले एक ध्वनि सुनाई देती है .....बैलगाड़ी के पहियों की.... ...याद आया ? आज भी वो धुन ज़िंदा है हमारी यादों मैं जबकि हमारी खुद की आवाज़ आज कितनी बदल गयी है ....वैसे ही जैसे की हमारे कितने ही रिश्ते बने और ख़तम हो गये !! कुछ आखरी साँसे गिन रहे हैं .....कहीं पाताल पानी हो रहा है कुछ लोग अपनो को ज़िंदा रखने के लिए खुद की जान गावा बीते ! रिश्ते सिर्फ़ काम निकल लेने के लिए नही होते .. समर्पण के भी लिए होते हैं .....चलिए जाने दीजिए धीरे धीरे चलिए साथ साथ रहेंगे नही तो एकांकीपन तो सर्वथा साथ है ही ......!! नोच के लेने और सिर्फ़ पाने मैं अंतर है.... अंतर रखिए , आनंद रहेगा !!
Thursday, July 21, 2011
" कुटिलता और कुशलता मैं अंतर "
" कुटिलता और कुशलता मैं अंतर "
" कुशलता से किया गया कार्य ..फलीभूत होता है...और कुटिलता के परिणाम सम्यक होते हैं , साथ साथ कुटिल व्यक्ति की सीमाएँ तय हो जाती हैं ....संपर्क सीमित हो जाते हैं और संवाद परेशान करने लगते हैं ! " आधुनिक बनिए ....आवश्यकता भर ही....... नही तो बारिश मैं कटान किसी नदी की जिस तरह दिशा बदल देता है उस तरह ..... वस्तु विहीन हो सकते हैं !!....कुटिलता प्रोटीन हो सकती है ....किंतु अधिकयी ...विनाश का कारण भी....!!Saturday, May 14, 2011
सारा अंतर तरन्नुम सा बजने लगा ....
आप शब्द बन गए मेरी भावनाओं के ,
सारा अंतर तरन्नुम में बजने लगा !
जिसको मरुथल ज़माने से कहते रहे ,
वो शहर आज दुल्हन सा सजने लगा !!
जून की धुप के पथ के राही थे हम ,
तुम चली स्नेह चन्दन लगाती हुई !
आस के घट भरे और सूखा किये ,
तुम चली घट पे धारा बहाती हुई !!
रिक्तियों की चुभन , तीष्ट होने लगी ,
तुम चली उष्ण बंधन सी छाती हुई !,
मन विलय के लिए अब तरल हो गया ,
हाँ के, ना के किनारों से बहने लगा ....!!
सारा अंतर तरन्नुम सा बजने लगा ...................
मीत मिलते रहे जैसे सपनों के दल,
हर निशा मैं दिशाओं का अनुमान हो !
तुम मिली जसे खुलती हुई पुस्तकें ,
जिनमे उलझन से सुलझन का व्याख्यान हो !!
रोज बढ़ते अनुज , रोज़ घटा समय ,
जैसे बढती हुई बेल , अविराम हो ,
तुमने आकर विरल कर दिए सब सघन ,
मन का हिम भी सरलता से बहने लगा !!
सारा अंतर तरन्नुम सा बजने लगा ...
- -- मनीष सिंह
सारा अंतर तरन्नुम में बजने लगा !
जिसको मरुथल ज़माने से कहते रहे ,
वो शहर आज दुल्हन सा सजने लगा !!
जून की धुप के पथ के राही थे हम ,
तुम चली स्नेह चन्दन लगाती हुई !
आस के घट भरे और सूखा किये ,
तुम चली घट पे धारा बहाती हुई !!
रिक्तियों की चुभन , तीष्ट होने लगी ,
तुम चली उष्ण बंधन सी छाती हुई !,
मन विलय के लिए अब तरल हो गया ,
हाँ के, ना के किनारों से बहने लगा ....!!
सारा अंतर तरन्नुम सा बजने लगा ...................
मीत मिलते रहे जैसे सपनों के दल,
हर निशा मैं दिशाओं का अनुमान हो !
तुम मिली जसे खुलती हुई पुस्तकें ,
जिनमे उलझन से सुलझन का व्याख्यान हो !!
रोज बढ़ते अनुज , रोज़ घटा समय ,
जैसे बढती हुई बेल , अविराम हो ,
तुमने आकर विरल कर दिए सब सघन ,
मन का हिम भी सरलता से बहने लगा !!
सारा अंतर तरन्नुम सा बजने लगा ...
- -- मनीष सिंह
Monday, May 2, 2011
नदियों के संग दुनिया देखें, ऐसे थे कुछ हम और आप !
" मुट्ठी मैं कुछ कांच के टूकडे ,
आँखों मैं महलों के खवाब,
नदियों के संग दुनिया देखें,
ऐसे थे कुछ हम और आप !
आज की खातिर बीत गया गया कल ,
कल की खातिर आज सजाएँ , धीर धीरे सो जाएँ !!
- मनीष सिंह
कल आयंगे मन के साथी उनीदी , उड़ान जी !!
"रेल की पटरी , पुल की सड़कें , मंदिर के भगवान् जी,
निंदिया रानी चुपके चुपके घर इनके मेहमान जी !
चौराहे की जलती बत्ती, रांहें उनकी तकती है ,
कल आयंगे मन के साथी उनीदी , उड़ान जी !!
उनके संग फिर से बहने को उमीदों से हो जाएँ ,
धीरे धीरे सो जाएँ !!"
निंदिया रानी चुपके चुपके घर इनके मेहमान जी !
चौराहे की जलती बत्ती, रांहें उनकी तकती है ,
कल आयंगे मन के साथी उनीदी , उड़ान जी !!
उनके संग फिर से बहने को उमीदों से हो जाएँ ,
धीरे धीरे सो जाएँ !!"
पलकों पर आगंतुक निंदिया, स्नेहिल सा अभिनन्दन है !!
" चन्दन - जल और रंग - पुष्प के बंधन हैं ,
पलकों पर आगंतुक निंदिया, स्नेहिल सा अभिनन्दन है !!
भोर - दोपहर सब कुछ बदला , संध्या आई रात हुई,
हम तुम भी अब कुछ कुछ बदलें, परिवर्तन को अपनाएँ !!
. .............. .... धीरे धीरे सो जायें !!
पलकों पर आगंतुक निंदिया, स्नेहिल सा अभिनन्दन है !!
भोर - दोपहर सब कुछ बदला , संध्या आई रात हुई,
हम तुम भी अब कुछ कुछ बदलें, परिवर्तन को अपनाएँ !!
. .............. .... धीरे धीरे सो जायें !!
सूनेपन मैं उत्सव जैसी , मेरी माँ , तुम्हारी माँ !
" अंधियारों मैं दीपक जैसी , धुप मैं शीतल छाया जैसी ,
सूनेपन मैं उत्सव जैसी , मेरी माँ , तुम्हारी माँ !
आओ माँ का आँचल ओढ़े , सुख सपनो मैं खो जाएँ ,
बंद मुट्ठी के जुगनू छोड़े , धीरे धीरे सो जाए !! "
सूनेपन मैं उत्सव जैसी , मेरी माँ , तुम्हारी माँ !
आओ माँ का आँचल ओढ़े , सुख सपनो मैं खो जाएँ ,
बंद मुट्ठी के जुगनू छोड़े , धीरे धीरे सो जाए !! "
- मनीष सिंह
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